Sunday, 24 April 2016

अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी ' हसरत ' का मौत से पहले देशवासियो के ना सन्देश

Computer

अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी ' हसरत ' का मौत से पहले देश वासियों के नाम एक सन्देश 


            अमर शहीद श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी ' हसरत ' हमेशा के लिए कब्र में दफना दिये गये । पर मौत से पहले देशवासियों के नाम एक सन्देश छोड़ गये थे जो इस प्रकार से है - ' प्यारे भारतवासी भाईयों ! आप कोई हो , चाहे जिस धर्म सम्प्रदाय के अनुयायी हो , आप देश - हित के काम में एक होकर योग दीजिये । आप ब्यर्थ में लड़ - झगड़ रहे है ।सब धर्म एक है , रास्ते चाहे भिन्न - भिन्न हो ; किन्तु लक्ष्य सबका एक ही है ।फिर झगड़ा बखेड़ा क्यों ? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों के लिए आप लोग एक हो जाइये और सब मिल कर नौकरशाही का मुकाबला कीजिये ।.... भारतवासी मुसलमानो में सबसे पहला मुसलमान मै हूँ , भारत की आज़ादी के लिए फांसी पर चढ़ते हुए , मन - ही - मन गर्व का अनुभव कर रहा हूँ । किन्तु मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मै हत्यारा नही था , जैसा कि मुझे साबित किया गया है -


दिल फ़िदा करते है , क़ुर्बाने जिगर करते हैं ,

पास जो कुछ है वह , माता की नजर करते है ,

खाने वीरान कहाँ , देखिये घर करते है ,

खुश रहो अहले वतन , हम तो सफर करते है ।


             इस सन्देश के बाद हम तो यही कहेंगे - अत्याचार जब निरंकुश होकर तांडव - नर्तन करने लगता है तब बलिवेदी पर चढ़ने के लिए तत्पर होने के अतिरिक्त अन्य उपाय ही क्या है !'
             कीड़े मकौड़े की मौत न मरकर , वीरो की तरह मरने वाले का ही नाम इतिहास मे स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है !'
             यह देश उसी का है , जो वतन के काम आये ........

Thursday, 4 February 2016

आज़ादी के दीवाने रास बिहारी बोस , लाला हरदयाल आदि


आज़ादी के दीवाने रासबिहारी बोस ,लाला हरदयाल आदि



                   हम जिस आज़ाद भारत में साँसे ले रहे है उसकी आज़ादी बहुत सारे आज़ादी के दीवानो के कुर्बानियो के परिणाम है , उनमे से बहुत सारे स्वतंत्रता के पुजारियों के कुर्बानियो को हम जानते तक नही या उन्हें हम धीरे धीरे भूलते जा रहे है उन्ही कुछ आज़ादी के दीवानो में रास बिहारी बोस , शचीन्द्र सन्याल , लाला हरदयाल , करतार सिंह , बिष्णु गणेश पिंगले आदि बहुत सारे क्रांतिकारी थे । रासबिहारी बोस एक अत्यंत भीमकाय , लम्बा चौड़ा और बलवान पुरुष थे ।उनका पिता बिनोद बिहारी एक सरकारी प्रेस में किरानी थे । 1902 में इंटर की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी रास बिहारी बोष ने पढ़ाई छोड़ दी ।आज़ादी के दीवाने बन गए ।देशभक्ति की भावना भरने और क्रान्ति के लिए सैनिको को तैयार करने के लिये वे सेना में भर्ती होना चाहते थे ।पर वे असफल रहे । असफल होने के बाद वे दिल्ली से बनारस पहुँचे ।क्रांतिकारियों के संघटन के लिए , सुप्रसिद् क्रांतिकारी श्री शचीन्द्र सन्याल से सहयोग प्राप्त किया ।वे बंगाली टोली में छिप कर रहने लगे ।वे रात्रि में शचीन्द्र के दल वालो से मिल कर उन्हें बम और पिस्तौल चलाना सिखलाते थे ।एक दिन शचीन्द्र सन्याल ने एक अखबार ला कर दिखाया जिसमे उनके फोटो सहित गिरफ्तारी के लिये 7500 रुपया इनाम देने की सरकारी घोषणा छपी थी ।
                        पंजाब के लाला हरदयाल ने एम. ए. की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया । सरकार ने उन्हें छात्रव्रत्ति देकर आई. सी. एस. के लिये इंग्लॅण्ड भेजा । वहां इण्डिया हाउस के क्रांतिकारियों से उन्हें भेट हुई ।और वहीं से उनका विचार परिवर्तन हुआ । वे सरकारी छात्रव्रत्ति लेना अस्वीकार किया ।और देश को पराधीनता से छुड़ाने के लिए आज़ादी के लड़ाई में कूद गए । लन्दन , पेरिस और बर्लिन के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने के बाद वे अमेरिका चले गए । अमेरिका में 'इण्डिया हाउस ' का अनुकरण कर लाला हरदयाल ने 'युगांतर ' आश्रम की स्थापना की । वहां रहकर भारतीय युवको को स्वतन्त्रता की पाठ पढ़ा कर आज़ादी की लड़ाई में उतारने लगे । उनमे कुछ क्रांतिकारी भी मिल गए जो श्री करतार सिंह , बिष्णु गणेश पिंगले , सोहन लाल पाठक आदि थे ।लाला हरदयाल ने युगांतर आश्रम से ' गदर ' नामक समाचार पत्र भी निकालना आरंभ कर दिए ।उसका पहला अंक नवम्बर 1913 को हैण्ड प्रेस पर छप कर निकला । कुछ दिनों बाद छोटी छोटी पत्रिकाएं भी छपने लगी । जिनका वितरण 'गदर ' पत्र के साथ गुप्त रूप से भारत में भी होने लगा ।इसी के फलस्वरूप अमेरिका में रहने वाले भारतीय तन मन धन से स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए जागरूक हो गए । गदर दल ले सदस्यों की संख्या सात हजार से भी अधिक हो गई।
                     श्री करतार सिंह लुधियाना के निवासी थे । उनके पिता मंगल सिंह जो करतार सिंह के बचपन में ही कल बसे । प्राइमरी स्कुल की पढ़ाई अपने गावं ' सराबा ' में पूरी करने के बाद हाई स्कुल की पढाई लुधियाना से पूरी करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास उड़ीसा के कालिक में दाखिल लिए । उनके चाचा जंगल विभाग में एक उच्च पदाधिकारी थे । वही से उन्हें स्वदेस प्रेम उतपन्न हुई और किसी तरह 1912 में वे अमेरिक चले गए । और वे बाद में गदर पार्टी के सम्पादक बन गए । श्री बिष्णु गणेश पिंगलर पूना निवासी थे । इंजनियरिग की पढ़ाई के लिए वर अमेरिका गए और वे वहीं गदर दल के सदस्य बन गए । 1914 में जर्मन महायुद्ध छिड़ गया । क्रान्ति के लिए ये माकूल समय था ।करतार सिंह , बिष्णु पिंगले , सोहन लाल पाठक , सत्येंद्र सेन आदि अधिकांश ' गदर ' दल के सदस्यों को भारत भेजना आरम्भ किया गया । अमेरिका ने अंतराष्ट्रीय दबाब में क्रांतिकारियों को दमन करने का निश्चय कर सन्फ्रेन्सिस्को में धर पकड़ शुरू कर दी ।लाला हरदयाल किसी तरह छुपते हुए जर्मनी पहुच गये ।अमेरिकी सरकार ने जर्मन - भारत षड्यन्त्र केस चलाकर अनेक क्रांतिकारियों को दण्डित किया । गदर पार्टी के संचालन की जिम्मेदारी अब हरदयाल ने अपने विश्वासी रामचन्द्र को सौपा । जर्मन पहुचने पर हरदयाल की मुलाकात राजा महेंद्र प्रताप , चम्पक रमण पिल्ले , डा. भूपेंद्र दत्त आदि अनेक भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियो से हुई ।
वहां बर्लिन सोसाइटी नामक संस्था थी ।जो पुस्तके प्रकाशित कर अंग्रेजो के विरुद्द पुरे विश्व में प्रचार करने की काम करती थी ।उसके मंत्री थे स्वामी विवेकानन्द के भाई भूपेंद्र दत्त । इस तरह विदेशो में रहते हुए लाला हरदयाल की भाषाओ के झनकार हो गए थे । वे अपनी योगयता के आधार पर जर्मन विदेश मंत्री के सहायक बन गये ।एक समय वे जर्मन के राजदूत के रूप में तुर्की के सुलतान से भी मिले थे । इस तरह अनेक भूले विसरे स्वतन्त्रता सेनानियो के करनामें हमारे स्मृति पटल से मिटने लगे है । क्रमशः

आज़ादी के दीवाने


जिनके बलिदानियों को हम भूल गए ।


            23 दिसम्बर , 1912 ई. को लार्ड हार्डिंग पर बम 23 दिसम्बर , 1912 ई, के दिन लार्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली से निकलने वाली थी । जगह- जगह भारी सुरक्षा की व्यवस्था थी । शानो - शौकत की तमाशा देखने के लिये अपार जन समूह एकत्र था ।बादशाही ठाट में सजे - सजाये हाथी पर लार्ड बैठे झूम रहे थे ।आगे पीछे फ़ौज पुलिस की कतार ...। सवारी कोतवाली के सामने से मारवाड़ी लाइब्रेरी के पास पहुची तभी बम का जोरदार धमाका हुआ ।लार्ड का अंगरक्षक औंधे मुहँ गिर कर दम तोड़ रहा था और लार्ड औंधे मुहँ गिर पड़ा । संयोग से लार्ड बच गया । कुछ देर बाद लार्ड अपने जगह पर दिखाई पड़े ।और उनकी सवारी आगे निकल गई ।उसके बाद उपस्थित दर्शको को घेर लिया गया ।उनकी घण्टो तलाशी हुई ।महिलाओं को तलाशी के दौरान अपमानित किया गया । पर बम फेकने वाले का पता न चला । 

          लॉरेंस गार्डेन , लाहौर के एक बम केस में पुलिस श्री अवध बिहारी लाल को खोज रही थी ।राजा बाजार कलकत्ता में एक छापे मारी के दौरान उनका पता पुलिस को मिल गया ।उस पते के आधार पर पुलिस अमीरचंद के घर की तलाशी ली । अमिरचन्द्र दिल्ली के कॉम्ब्रिज मिशन है स्कुल में अध्यापक थे ।घर में अवध बिहारी लाल अपने दो साथी के साथ एक टोपी बम के साथ पकड़े गए ।साथ में लाहौर से भेजा गया दीनानाथ का एक पत्र भी सी . आई.डी. वालो के हाथ लग गया । उस समय मास्टर घर पर नही थे ।पर उनका दत्तक पुत्र सुलतान मौजूद था ।पुलिस उन सबको पकड़ कर ले गई ।रास्ते में मास्टर अमीचन्द घर लौटते समय पुलिस के हाथो लग गए । सुलतान को डरा धमाकर पुलिस ने अपना पक्षधर बना लिया । वह घर में आने जाने वाले क्रांतिकारियों का पता बता दिया ।साथ ही दीनानाथ के लिखावट को भी पहचान कर पुलिस को बता दिया ।दिल्ली षड्यंत्र के नाम से मुकदमा चला । मास्टर अमीरचंद , अवधबिहारी लाल , बालमुकुंद और बसन्त कुमार को फंसी की सजा मिली ।
       संगठनकर्ता रासबिहारी बोस इनलोगो के गिरफ्तारी के बाद दिल्ली छोड़ दिए । देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट में हेड क्लर्क रासबिहारी बोस थे ।उसने अमेरिका के सुप्रसिद् हिन्दुस्तानी विद्रोही लाला हरदयाल के एक शिष्य दीनानाथ , अवध बिहारी , बालमुकुंद को पर्चा बाटने और बम फेकने के लिये ठीक किये ।उनका एक बंगाली नौकर बसन्त कुमार विश्वास भी इस काम में उन लोगो का सहयोगी था । दिल्ली बम कांड केस में जैसी गवाही हुई उसे साबित हो गया की लार्ड पर बम फेकने में इनका हाथ था । इस मामले में अवध बिहारी , अमीरचंद और बसन्त को फांसी की सजा हुई ।पर आश्चर्य की बात , रासबिहारी बोस इतना अत्यंत बलवान और भीमकाय पुरुष थे पर कैसे पुलिस से बच कर भाग गए । आगे लाला हरदयाल और रास बिहारी बोस एवं अनेक क्रान्तिकारीयों को जिनके बलिदानो के फलस्वरूप हम आज़ाद हुए , जिन्हें हम जानते तक नही या हम भूल चुके उन क्रांतिकारीयों के करनामें ।

Sunday, 31 January 2016

जागो अब जगो


जागो अब जागो





जागो अब जागो ,
पहने फूलो का माला ,
बनता जन का रखवाला ,
निर्धन का छीननेवाला ,
 करता नित दिन घोटाला ,
 बोलता गांधी का भाषा ,
 सब बढ़े यही अभिलाषा ,
 जन्मे तो घोर निराशा ,
 निर्धन नीच हो जाता ,
दो जून नही खा पाता ,
 बस ये ही है उन्हें भाता ,
 चुने देख भाग्य विधाता ,
 निचे धरती ऊपर नेता ,
 पंक्षी करते कलरव ,
 करते धोखा ये नेता ,
 आ गया वक्त अब जागो
 अब जागो अब।।

Saturday, 30 January 2016

ऋण मातृभूमि का चुकाएंगे

 ऋण मातृभूमि का चुकाएंगे



सामना करेंगे  , शक्तिशाली सितंगरों का ,

 दमन का न भय , नाको चने चबवायेंगे ।

 स्वतन्त्रता संग्राम के , तो हम सिपाही है ,

 प्राण देकर , ऋण मातृभूमि का चुकाएंगे ।।

मैं एक नारी हूँ

एक नारी हूँ  



सिसकी सुनकर

 किसी ने उससे कहा

तुम क्यों रोती हो ,

 ब्यर्थ में क्यों

समय खोती हो , 

सहम कर बोली वह , 

अपनों की उपेक्षा की मारी हूँ ,

अपने ही घरो में बनी बेचारी हूँ ,

कहने को तो सबकी प्यारी हुँ ,

पर उपेक्षित , अपमानित एक नारी हूँ ।।

दिल फ़िदा करते है कुरबाने जिगर करते है

    दिल फ़िदा करते है , कुरबाने जिगर करते है






दिल फ़िदा करते है , कुरबाने जिगर करते है ,

पास जो कुछ है , भारत माता की नजर करते है ,

खाने वीरान कहाँ , देखिये घर करते है,

खुश रहो अहले वतन , हम तो सफर करते है ।।

अत्यचार जब निरंकुश हो कर तांडव नर्तन करने लगता है

तब बलिवेदी पर चढ़ने के लिये तत्पर होने के अतिरिक्त

अन्य उपाय ही क्या है ?

Friday, 29 January 2016

यहां जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है ,मौत बिकती है बोलो खरीदोगे


यहां जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है ,मौत बिकती है बोलो खरीदोगे । 



 आइये नजर डाले बाजार में बिक रही उन नशीली समानो पर जो खुलेआम बिक रहे है ।ऐसे मौत जो न किसी बन्दूक की गोली से न ही किसी हादसे से होती है बल्कि खुलेआम खरीदे जा रहे है ।जिसको बेचती है सरकार वो भी डंके की चोट पे , सरकार द्वारा जनहित में जारी बिज्ञापन से इसके दुष्परिणाम बताकर लोगो को मौत के मुँह जाने से नही रोक जा सकता ।बल्कि इसपर पूर्ण रूप सर प्रतिबन्ध लगाकर ही लोगो को मौत में जाने से रोका का सकता है ।पर सरकार की क्या कहना , उसने गुटखा , तम्बाकू पर प्रतिबन्ध लगाने के बजाय प्लास्टी पाउच में बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ।ऐसे में सरकार क्या साबित करना चाहती है ये सरकार ही जाने । चलिए बात करते है उन मौतों को जो तम्बाकू के सेवन से होती है।सरकार द्वारा इसके सेवन न करने की सलाह लगातार बिज्ञापन के माध्यम से दी जाती है । दूसरी तरफ गुटखा से लगातर टेक्स वसूल कर बाजार में बेचवाती है और सोचनीय विषय यह है की जिस चीज से केन्सर होने की जानकारी दी जाती है , उस चीज को बाजार में बेचने की अनुमति क्यों ?
         होना तो यह चाहिए की जिस सामग्री से लोगो की जान जा सकती है उस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देनी चाहिये न की टी.वीं. एवं अखबारो में विज्ञापन देना चाहिए कि इसका सेवन न करो ।और तो और सरकार के आदेशानुसार सिगरेट और तम्बाकू के पाउच पर बिच्छू की आकृति के साथ , ये शब्द की ये जानलेवा है , इसके सेवन से कैंसर हो सकते है , इसकी प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दी गई है । क्या ऐसा लगता है की ऐसा प्रदर्शित कर देने से लोग इसको नही खाएंगे । सिप्रिम कोर्ट ने गुटखा के प्लास्टिक रेपर से प्रदूषण न फैले इस लिये प्लास्टिक की रेपर पर बैन लगा दी ।आखिर एक चीज नही समझ में आता की सरकार को इस तरह खुलेआम मौत बेचने की मजबूरी क्या है ? आज न जाने कितने लोग इसके सेवन से मर गए है और न जाने कितने लोग इसके सेवन से होने वाली वीमारी के कारण मौत से जूझ रहे है ।सबसे अधिक इसके सेवन से गरीब मरते है ।एक तरफ सरकार इस जहरीली पदार्थ से टेक्स वसूलती है और दूसरी तरफ केन्सर के हॉस्पिटल खोलवाती है और केन्सर के मरीजो को सब्सिडी देती है । ये सरकार की दोगली मानसिकता समझ से परे है बहराल देखना यह है की सरकार इस तरह की सामग्री पर कब तक पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगाती है और कब इनसे हो रही मौत को रोकने में दिलचस्पी लेती है ?

लौ जलाई है हमने

लौ जलाई है हमने

लौ जलाई है हमने , 

इसे ज्वाला आपको बनाना होगा ,

 चन्द चेहरे बेपर्दा किये है हमने,

 अब कारवाँ आपको बनाना होगा , 

हुकूमतें लगी है डरने ,

 हमारे पहले ही आह्वान पर , 

आम आदमी आओ चले ,

 अब संसद को हिलाना होगा ।


नितीश सरकार से बिहार के लोग अँधेरे में उजाले की उम्मीद जगाये बैठे है ।

Wednesday, 27 January 2016

अमर शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी

                 अमर शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी


               


खुदीराम बोस मेदिनपुर के निवासी थे ।बहूवैनी गांव में उनका पैतृक घर था ।उनके पिता तैर्लोक्यनाथ बोस तहसीलदार थे ।माता का नाम- लक्ष्मीप्रिया देवी ।जन्म तिथि 3 दिसम्बर 1889 ई.।

उनकी विप्लव पार्टी के नेता श्री सत्येंद्र बोस थे ।

        क्रांतिकारियों ने छोटेलाल और कलकते के ही एक प्रेसिडेंसी मैजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को प्राण दंड देने का निर्णय लिया ।लाट बंग - भंग कार्यान्वित करने का अपराधी था ।और किंग्सफोर्ड ने अपने इजलास के सामने नारा लगाने और पुलिस से झगड़ने के कारण सुशिल सेन नामक एक युवक को पन्द्रह बेत मारने की सजा दी थी । और उसने बंग - भंग के विरोध में लिखे गए लेखो को राजद्रोहात्मक ठहराकर कई लेखको , पत्रकारो को दण्डित किया था ।

             6 दिसम्बर , 1907 को वह गवर्नर ट्रेन से जा रहा था । एक जगह जोरदार बम का धमाका हुआ । जिस डिब्बे में वह बैठा था उसे उड़ाने का उद्देश्य था संयोग से उसके पीछे वाला डिब्बा निशाना बना ।वह डिब्बा चूर चूर हो गया ।गवर्नर बाल बाल बच गया ।

 बम मारने वाला का पता नही चला ।

      खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंगस्फोरड को मारने का भार अपने कन्धों पर सहर्ष उठाया ।वे सुशील सेन की पिटाई को नही भूले थे ।बदला लेने के लिये उतावले थे ।

      चाकी ' बाकुंडा ' के निवासी थे ।दोनों बिप्लवि शाखाएं श्री अरविन्द से प्रभावित थे ।चाकी के दल के नेता नेता थे यतीन्द्र राय ।गवर्नर बम कांड में श्री हेमचन्द्र के सहयोगी थे प्रफुल्ल चाकी । किंग्सफोर्ड कलकते से मुजफरपुर चला आया सेशन जज बनकर ।उसकी सुरक्षा के लिए दो सशस्त्र जवान हमेशा लगे रहते थे ।

                प्रफुल्ल चाकी के साथ खुदीराम बोस भी मुजफरपुर पहुच गए । स्टेशन के समीप ही मोतीझील धर्मशाला में ठहर कर दोनों अवसर की तलाश करने लगे ।उनके पास जो बम थे उनको बनाने वाले थे उल्लासकर दत्त और हेमचन्द्र ।

         वहां अंग्रेजो का एक क्लब था ।उसके निकट ही किंग्सफोर्ड का निवास था ।वह प्रत्येक दिन क्लब में जाता और घण्टे दो घण्टे बाद क्लब से वापस आता । खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने उसके लौटते समय बम मारने का निर्णय लिया । उसके गाडी और घोड़े की पहचान उन दोनों ने कर ली ।

         लगभग बारह दिनों बाद 30 अप्रैल 1908 को अनुकूल अवसर मिला , वे दोनों तैयार हो कर क्लब के पास पहुचे ।उन दिन पहरे पर फैजुद्दीन और तहसिलदार खाँ नामक पुलिस के जवान तैनात थे ।उनकी नजर उन दोनों युवकों पर पड़ी ।उन्होंने डाट कर दोनों युवको को भगा दिया ।

      दोनों सड़क के किनारे एक पेड़ के पीछे छिप कर किंग्सफोर्ड कर लौटने की प्रतीक्षा करने लगे ।

     एक घोडा गाडी क्लब से निकली । दोनों सावधान हो गये । रात्रि के आठ बज रहे थे ।आँधियारी रात ! वह घोड़ा गाडी सामने से गुजरने लगी ।किंग्सफोर्ड की गाडी की तरह गाडी और वैसा ही घोड़ .....

पहरेदार ने जोरदार बम का धमाके सुना ।दोनों घटना स्थल की और दौड़ पड़े ।उन्होंने दोनों युवको को भागते हुए देखा ।अंधरे में उनकी आकृति देखकर पहचान गए की वे दोनों वही युवक है , जिन्हें क्लब के पास से कुछ समय पहले भगाया था ।

   फिटन के टुकड़े बिखर गए ।एक गोरा वकील पी . केनेडी की पत्नी और उसकी बेटी घायल होकर तडप रही थी ।कोचवान भी घायल हो गया था । तहसीलदार खान ने थाने में सुचना पहुचाया । और बम मारने वाले की हुलिया भी लिखवाया । नगर की घेराबन्दी हो गई ।

     किंग्सफोर्ड और केनेडी की फिटन एक जैसी थी ।दोनों के घोड़े के रंग एक जैसे थे । केनेडी के पुत्री कुछ देर बाद मर गई , किन्तु उनकी पत्नी दो दिनों बाद 2 मई को मर गई ।

       बम कांड के बाद दोनों रेलपथ के किनारे किनारे पूरब की और निकल गए । वे सिलौत और ढोली से गुजरते हुये पुसारोड स्टेशन पहुचे ।आगे की यात्रा अलग अलग करने का निर्णय किया गया ।एक साथ रहने से पुलिस के पकड़ में आने की सम्भावना ज्यादा थी । निकट में ही बैनी नामक बाजार था । चाकी को बगीचे में छोड़कर खुदीराम बाजार में पहुचे , और निरसु नामक एक एक दुकानदार के दूकान में बैठे ।

       एक चौकीदार उसी दूकान में पहले से बैठ था उसकी दृष्टि खुदीराम पर पड़ी । घुंघराले बाल , लम्बा मूंछ सत्रह अठारह साल का बंगाली युवक ।उसे सन्देह हुआ । थाने के दरोगा ने जिन दो युवको पकड़ने को आदेश दिया था उनमे से एक का हुलिया उससे मिलता था ।वह खुदीराम की गतिबिधि पर ध्यान देने लगा ।

     वहा अन्य लोग वार्तालाप कर रहे थे ।उनकी बातचीत का विषय था मुजफरबमकाण्ड .... बम से वकील केनेडी की बेटी मर गई और उसकी पत्नी भी बचने वाली नही है । कान में पड़ते ही खुदी राम अचानक चौक पड़े , वे दही चूड़ा खा रहे थे और खाते खाते उनके हाथ रुक गए । पूछ बैठे - क्या किंग्सफोर्ड नही मरा ।

        चौकीदार का सन्देह विश्वास में बदल गया ।वह दूकान के बाहर निकल गया ।निरसु साह के दूकान के सामने ही कल्लू मारवाड़ी के कपड़े की दूकान में शिवप्रसाद सिंह और फतह सिंह नामक दो सिपाही सादे लिवास में दूकान में बैठे थे ।चौकीदार से सुचना मिलते ही वे दोनों ने खुदिराम को वे जब हाथ धो रहे थे दबोच लिया ।कुँए से पानी निकालने वाली रस्सी से हाथ बाँध कर सिपाहियो ने उन्हें थाने में पहुचाया ।उनके पास से एक भरी हु बन्दूक और एक रिवाल्वर बरामद हुआ ।उन दोनों सिपाहियो द्वारा ही उन्हें मुजफरपुर भेजवाया ।दर्शको ने आश्चर्यचकित हो कर देखा कि खुदीराम के चहरे पर उदासी की छाया नामात्र भी नही थी वे मुस्करा रहे थे ।

  खुदीराम बोस के विरुद्द तीन सौ दो का धारा लगाकर मुकदमा चला । उनके तरफ से काम करने के लिए कोई भी वकील तैयार नही हो रहे थे तब स्थानीय वकील कालिदास बोस ने कमर कसी ।सरकारी वकील थे पटना के मानक साहब और बिनोद मजूमदार ।खुदीराम बोस के खिलाफ दोष साबीत नही हुआ किन्तु उन्होंने साहस पूर्वक स्वीकार किया कि हमने ही बम फेका था । उन्हें फांसी की सजा मिली । 11 अक्टूबर 1908 को फांसी का दिन निश्चित किया गया ।

         खुदीराम हँसते हँसते फांसी पर लटक गए । उनके मुँह से निकले बन्दे मातरम् और उनके हाथ में थी गीता का किताब ।और इस तरह वे शहीद हो गए ।उनकी इच्छा अनुसार उनका अंतिम संस्कार कालिदास बोस द्वारा सम्पन हुआ ।फूलो से अरथी सजाई गई । अखड़ाघाट बूढी गंडक के किनारे , चिता पर उनके पार्थिव शरीर को मुख अग्नि दिया गया। अपार जनता श्मशान यात्र में सम्मलित हुए और चिता भस्म को माथे पर लगाते हुये अपनी श्रधांजलि अर्पित की ।

उनकी बलिदान पर किसी देशभक्त ने यह छंद लिखा


शहीदों के खूँ का असर देख लेना ।

मिटायेंगे जालिम का घर देख लेना ।।

झुका देंगे गर्दन को हम जेरे खंजर ।

ख़ुशी से कतायेगें सर देख लेना। ।

जो खुदगर्ज गोली चलाएंगे हम पर ।

तो कदमो में उनका ही सर देख लेना ।।



             उधर पूस के बगीचे से प्रफुल कुमार चाकी समस्तीपुर की ओर बढ़े ।दोपहर तक वे वहां पहुँच गए ।चेहरे पे थकावट के चिन्ह् थे और भूख सता रही थी ।रेलवे कर्मचारी के क्वाटर्स की ओर घूमते हुए ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे ।एक रेलवे कर्मचारी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ , अखबारो में बम कांड के बारे में छपी थी और उसने पढ़ी थी ।चाकी से उसने पूछताछ की उन्होंने टालना चाहा ।कर्मचारी देशभक्त था ।उसने सहानुभूति प्रकट करते हुए चाकी को राजी कर लिया अपने क्वाटर्र में समय गुजारने के लिये ।

      चाकी ने उस देश भक्त के यहां खाना खाने के साथ रात्रि विश्राम भी किया ।दूसरे दिन , दो मई को वे ट्रेन में सवार हुये । कलकते की रेल टिकट भी उस कर्मचारी के द्वारा प्राप्त हुआ ।

जिस डिब्बे में चाकी घुसे उसमे नन्दलाल बनर्जी नामक दरोगा भी यात्रा कर रहा था । सिंहभूमि के थाने में वह पदस्थापित था ।अवकाश के दिनों में वह अपने नाना शिवचन्द्र चटर्जी के यहां व्यतीत कर , सिंहभूमि वापस जा रहा था ।वह बमकांड के दिन मुजफरपुर में ही था । उसे घटना की जनकारी थी ।

    चाकी पर नजर पड़ते ही वह इंस्पेक्टर चूक पड़ा । चौड़ा मुँह , सर पर छोटे छोटे बाल , कसरती बदन , नई उभरती मूंछ - बम फेकने वालो में से एक की हुलिया उसे मिलता था ।उस इंस्पेक्टर ने उसे बात करने की प्रयास किया चाकी अनसुनी कर दी ।बनर्जी का सन्देह बढ़ा ।

          अगले स्टेशन पर चाकी दूसरे डब्बे में चले गए ।बनर्जी की नजर उनका पीछा कर रहा था । उसने मुजफरपुर अधीक्षक के नाम एक तार भेजा । ट्रेन मोकामा पहुची ।वहां चाकी को गिरफ्तारी का तार मिल गई ।वह स्टेशन मास्टर के सहयोग से कुछ रेलकर्मियों के सहयोग से चाकी को पकड़ने चला ।

    मुझे आपको गिरफ्तार करना है .. सन्देह पर .. बनर्जी ने प्लेटफार्म पर टहलते हुये चाकी को रोक कर कहा । और उसका वाक्य अधूरा ही रहा - चाकी ने अपनी पिस्तौल से उस पर गोली चला दी ।निशाना चूक गया ।बनर्जी झुक गया उसके सर के ऊपर से गोली निकल गई । रेल कर्मचारी चाकी को पकड़ने के लिए दौड़े ।पकड़े जाने के पहले प्रफुल्ल चाकी ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली ।शहीद होने के पश्चात भी उनके चहरे पर स्वभिमान और आक्रोश की झलक थी ।

     कुछ दिनों बाद एक फिन सियालदह के किसी गली से गुजरते हुये क्रांतिकारी जी . दास गुप्ता ने गोली से उडा दिया ।बनर्जी को चाकी को पकड़ने के प्रयास के कारण प्रोन्नति हो गई थी ।

             जहाँ से खुदीराम बोस ने केनेडी की गाडी पर बम फेक था वहां उनकी मूर्ति स्मारक के रूप में अवस्थित है ।बैनी बाजार में निरसु साह क्व दूकान में जहाँ दही चुडा खाया वह भी था वहा भी उनका स्मारक बना जिसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा उद्घाघाटन हुआ ।


अमर रहेगा नाम शहीदों , सूरज चन्द्र समान ।

अमर बना इतिहास , लहू का अंकित अमिट निशान ।।



(बिंध्याचल प्रसाद की रचना के कुछ अंश )



Tuesday, 26 January 2016

vindhyaachl prasad gupt -wikipedia

विंध्याचल प्रसाद गुप्त



नाम - : विंध्याचल प्रसाद गुप्त (कवि )

जन्म - : 26 अक्टूबर 1915

मृत्यु :24 जुलाई 1992

जन्म स्थान : चनपटिया , ( पश्चिम चम्पारण ) बिहार

पिता : स्व. बनारसी साह

 शिक्षा : राष्ट्रीय विधालय चनपटिया , काशी विधापीठ से उच्च शिक्षा
क्रान्ति के यात्री बने : किशोरावस्था से ही स्वतन्त्रता संग्राम में संलिप्त रहे । चम्पारण के सशस्त्र क्रान्तिकारियों कमलनाथ तिवारी , केदारमणि शुक्ल , कपिलदेव राय , गुलाबचन्द गुप्त ' गुलाली ' एवं प्रख्यात नेता डा. राम मनोहर लोहिया के निकट सम्पर्क में रहे ।स्वतन्त्रता संग्राम में नमक सत्याग्रह से अगस्त की निर्णायक क्रान्ति तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
1937 से लेखन का जो आरम्भ हुआ वह जीवनपर्यन्त चलता रहा ।अपने क्रांतिकारी मित्रो और बन्धुओं के त्याग , तपस्या और उनके बलिदान की गथा जन -जन तक पहुचाना अपना पावन कर्तव्य मानकर लेखन को ही सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया ।

उनकी रचनायें :
-------------
उपन्यास : भीगी आँखे (1946) , कांटो को राह में जयप्रकाश और उनके साथी (1947), लहरो के बिच(1949) , राह का पत्थर ,हंसती आँखे , आधी रात , किनारे की ओर , नीली साडी ,आग और आँसू , तूफ़ान के तिनके , मीठी आग , मंजिल के राही , चम्पारण और निल के धब्बे (1959) , सिमा और उड़ान , छोटे बड़े लोग (1985), क्रांतिकारी : भूले बिसरे और क्रान्ति - यात्रा ।
कथा संग्रह : मुस्कान (1939),बिखरे आँसू , बलिदान की कहानियाँ ।
कविता संग्रह : आंधी पानी , सूरज चाँद सितारे ।
नाट्य कृति : शीशदान ।
बाल उपन्यास : अंतरिक्ष में नया लोक , कल्लू काका , बाघ हमारे साथी ।
एकांकी : लहरें , सिकन्दर जब चला , पीपल के पत्ते , अमिट रेखायें ।
     उपर्युक्त कृति के अलावे अनेक रचनायें यत्र तत्र पत्र -पत्रिकाओ में बिखरे पड़े है ।

Saturday, 9 January 2016

हे मजदूर किसान ! नमस्कार !

हे मजदूर किसान ! नमस्कार !




हे मजदूर किसान ! नमस्कार !
सोने - चांदी से नही किंतु
तुमने मिटटी से किया प्यार ।
हे मजदूर किसान ! नमस्कार !
ये खेत तुम्हारी भरी - सृष्टि
तिल-तिल कर बोये प्राण बिज
बर्षा के दिन तुम गिनते हो ,
यह परिवार है , यह दूज , तीज
बादल वैसे ही चले गये ,
प्यासी धरती पायी न भीज
तुम अश्रु कणों से रहे सींच
इन खेतो की दुःख भरी खीज
बस चार अन्न के दाने ही
नैवेध तुम्हारा है उदर
हे मजदूर किसान ! नमस्कार !

Thursday, 7 January 2016

जा हम तुमसे बात नही करेगे

पठानकोठ हमले के बाद मोदी जी ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जबाब दिया जिसे पाकिस्तान को छठी का दूध याद आगया, बोले जा हम तुमसे बात नही करेगें ।इसे पाकिस्तान डर के मारे कापने लगा ।
दरअसल , आतंकवादी हमलो से जुड़े हादसों की भी एक शब्दवाली बन गई है ।एकदम अलग ।जो समूचे देश में एक तरह से बिना भेद भाव लागू है ।देश में सरकारे चाहे किसी की भी हो ।कांग्रेस हो , भाजपा हो या फिर किसी भी गठबंधन की हो ।निंदा , शक , हाईअलर्ट , मुआवजे का एलान आदि ।जांच कमिटी । आतंकियों का स्केच जारी करना , आम जनता से भाईचारे एवं सम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने का अपील करना ।और दिल्ली में आपात बैठक बुलाये जाने के बाद वही ढाक के तीन पात ।और हां यह जुमला हमेशा की तरह , भारत इस आतंकवादी घटना का घोर निंदा करती है ।हम इस कायराना हरकत का मुंहतोड़ जबाब देगें ।ऐसी कायराना हरकतों से भारत हिलने वाला नही ।हम ऐसी हमलो का डट कर मुकबला करने के लिये तैयार है ।दो चार दिन बाद फिर से सब कुछ पटरी पर । लोग भूल जाते है ठीक उस दिन तक जब तक कि फिर कोई दूसरा आतंकवादी हमला नही होता ।

Thursday, 31 December 2015

आओ हमसब मिलजुल कर (2016)नव बर्ष का पर्व मनाये

आओ हम सब मिल जुल कर
नव बर्ष का पर्व मनाये
************************
राष्ट्र हितों के लिये समर्पित
हो फिर से सर्वस्व हमारा
गौरव मंडित हो भारत यह
सत्य धर्म का मिले सहारा
                      त्यागे हम सब स्वार्थ भावना
                      परमार्थ का पथ अपनाए
                      आओ हम सब मिल जुल कर
                      नव बर्ष का पर्व मनाये
भष्ट्राचार मिठे शासन का
शुद्व बने आचरण हमारा
अनाचार से लोहा लेने
बढ़े युवक भारत का सारा
                          अनुशासित हो कर्मी सारे
                           सत्य कर्मो को गले लगाये
                          आओ हम सब मिल जुल कर
                          नव बर्ष का पर्व मनाये
भगत -सुभाष -शिवा-राणा का
गूँजे भू पर गौरव गान
राम कृष्ण की परम्परा को
मिले पुनः भू पर सम्मान
                     सारे महि मण्डल को हम फिर
                      एक नया आलोक दिखाएं
                      आओ हम सब मिल जुल कर
                      नव बर्ष का पर्व मनाये
मित्र बने आपस में हम सब
मित्र भाव का हो विस्तार
उग्रवाद , आतंकवाद का
हो अति शीघ्र यहां निस्तार
                       बच्चे-बच्चे इस भारत के
                       शौर्य शील - बलशील कहाऐ
                        आओ हम सब मिलजुल कर
                        नव बर्ष का पर्व मनाएं
सुख समृद्धि सफलता का
हो हमारे जीवन में विस्तारण
सभी समस्याओ का हो फिर
यथा योग्य सम्पूर्ण निवारण
                        समरस हो सारा समाज यह
                          मानावत काबने हितैषी
                         सभी सुखी सम्पन्न बने फिर
                          प्रगति करें हम भौतिक ऐसी
राष्ट्र अस्मिता की रक्षा हित
हर्षित होकर प्राण लुटाएं
आओ हम सब मिलजुल कर
नव बर्ष का पर्व मनाये ।।



Sunday, 27 December 2015

जागो आंधी उठाने का जमा ना आ गया है

जागो आंधी उठाने का जमाना आ गया है


जागो आंधी उठाने का जमाना आ गया ,
दे रहा आदमी का दर्द अब आवाज दर-दर ,
 तुम न जागो तो कहो जमाना क्या कहेगा ,
 जब बहररों का नीलाम पतझर कर रहा है ,
 तुम नही फिर भी उठे तो आशियाना क्या कहेगा ,
 वक्त की तकदीर स्याही से, लिखी जाती नही है ,
 खून में कलम डुबोने का जमाना आ गया है ,
 बदतमीजी कर रहे है आज ,
 फिर भौरे चमन में जागो ,
आंधी उठाने को जमाना आ गया है ।।

Saturday, 26 December 2015

उठ देश कर त्राहि- त्राहि

उठ देश कर त्राहि - त्राहि 





उठ देश कर त्राहि - त्राहि अब तो इसे बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,
प्रलय काल की दुंदभी , गरल- सिंधु उफनाया ,
अनय वहि की लपटो में, सारा संसार समाया ,
हुआ राष्ट्र शापित , शापो पर अब तो नजर गड़ाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,
अभय दान दो पशुता से , जकड़ी नरिह नरता को ,
हिंसा की जिह्वा पर बैठी , चीख रही जनता को ,
छली जा रही है संस्कृति , जड़ता को मार भगाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ , 
छल प्रपंच के कीचड़ दे , यह भरी हुई धरती है ,
उधर वासना तृषण फण , फैलाये से चलती है ,
लूट रही भारत की जनता को इन अत्याचारियों से बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ।।

तो कौन प्रेम की सरिता बहाये


तो कौन प्रेम की सरिता बहाये




जब ढोंग नाग बनकर डंसने लगे
आदर्श नागफेनी से चुभने लगे
कृतिया मवाद सी बहने लगे
धर्म आतंक बनने लगे
तो ह्रदय के दग्ध कोने में
कौन प्रेम की सरिता बहाये --?
झूठी कल्पनाये
सारी जिंदगी हम बिस्तर बनने लगे
तो प्रेयसि और प्रियतम की सच्चाई
कहा तक होगी --?
जब घर घर विभीषण होने लगे
तो राम और लक्षमण की परिभाषा कैसी -----?
धन लगी जिंदगी में
विवाद बढ़ने लगे
रोपता फूलो को हूँ
कैक्टस उगने लगे
तो कैक्टस और नरगिस में अंतर कैसा ---?
जब से मिट गए है फर्क
उच्चता और निम्नता के
बदल गए है है सन्दर्भ आदर्श के
आ गयी है सीलन जीवन में
जहर पलने लगी है हरेक पेट में
और
कहते फिरते है हम अमृत उसे
सिलवटे पड़ने लगी है हरेक विस्तर में
दर्द के फफोले उगने लगे हरेक चेहरे में
न जाने आतंक कैसा हो
आशंका घेर रही है अभी से हमे ---?

Friday, 25 December 2015

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गांव में

गली गली है यही वेदनां ,शहर -शहर हर गावं में ,

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गावं में ।

लोकतंत्र अभिशाप बन गया ,संसद आहे भरती है ,

नेताओं के नंगेपन से , भारत माता डरती है ।

निशदिन द्रोपदियो की , इज्जत लगी हुई है दाव पर ,

आजादी का कत्ल हुआ है ,आजादी के गांव में ,

संतरी से लेकर मंत्री तक , धन वैभव का होड़ है ,

देश धर्म के हत्यारों का कदम -कदम पर जोड़ है ,

कफ़न खसोटू बैठे सारे , कानूनों की नए में ,

आजादी का कत्ल जुआ है , आजादी के गांव में ।।


अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है

हम लोग कायरता के विरुद्ध पढ़ बोल और सुन तो सकते है पर कर कुछ नही सकते , कायरता का विषाणु हमारे अंदर घुस आये है , तभी तो सर और खौफ का मंजर समाप्त न होता ।अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है ।

हमे अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा

हमें अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा । भारत में बहुत कुछ है जो विश्व में कही नही है। हमारी संस्कृति की यह विशेषता है की वह अजर अमर है । किन्तु 68 वर्षो में हम जात-पात , सम्प्रदाय और ऊंच-नीच में बटते चले गये और बन्धुत्व को भूल गये । चिड़ियों और चींटियों की चिंता करने वाला हमारा समाज हिंसक बनता जा रहा है ।नफरत की फसल लगाने की होड़ लग गयी है ।अग्नि से यज्ञ करने के बजाए हम लोग आग लगाने में जुट गए है ।

निशाचरी शक्तियों का अभिशाप

देश लूट रहा है , पिट रहा है , आताताई , अराजक , निशाचरी शक्तियों का आतंक देश के जन जीवन के लिये स्थायी अभिशाप बनता जा रहा है ।

पचास साठ करोड़ लोग

सत्ताधीशो के तमाम दावेवेदारियों के बावजूद अभी भी पचास साठ करोड़ लोग बे मकान , बे रोटी लोगो का यह देश जिस अँधेरी सुरंग से गुजर रहा है उसका दूसरा सिर दूर -दूर तक नजर नही आता ।

यहां पे जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है

खुदा हमको बता दो , यह कैसी बस्ती है


खुदा हमको बतादो,यह कैसी बस्ती है ,
जहां जिंदगी के परदे में ,मौत पलती है ,

किसी की पाव तो पड़ते है फर्श मखमल पर
 किसी की लाश कफ़न के लिये तरसती है ,

 मेरे पड़ोस के जालिम ने लूट ली अस्मत,
कोई जवां लड़की यह कहती है और जलती है ,

यह कौन लोग है, मख्लूक कौन सी है ?
गर्दन को काट के कहते है , मस्ती मस्ती हैं ,

खुदा के घर को गिराते है और कहते है ,
 आवाज बुलन्द करो , खुदा की यह बस्ती है ,

न इनको खौफ -ए-खुदा है और न आदमी का ख्याल ,
यह कैसा धर्म है जहां , इंसानियत सिसकती है ,

जवां गुचों को कुचलो , कली मसल डालो ,
यहाँ पे जिंदगी महंगी है , मौत सस्ती है  ।

कृषि प्रधान देश

पहले था कृषि प्रधान देश ,
 सचमुच था ऋषि प्रधान देश ,
 पहले था आत्मीयता प्रधान देश ,
 वास्तव में संस्कृति प्रधान देश ,
मगर आज हो गया है ---
 कुर्सी प्रधान देश ,
मातम पुर्सी प्रधान देश ,
 नौटँकी प्रधान देश ,
 ढपोरशंखी प्रधान देश ,
घोटाला प्रधान देश ,
गड़बड़झाला प्रधान देश ,
भाषण प्रधान देश ,
कुशासन प्रधान देश ,
 खुदगर्जी प्रधान देश ,
 खुदमरजी प्रधान देश ,
 आबादी प्रधान देश ,
 बर्बादी प्रधान देश -

Thursday, 24 December 2015

गुंडा बना नेता या नेता बना गुंडा

गुंडा बना नेता या नेता बना गुंडा


वर्तमान लोकतन्त्र में नेता और गुंडा चोली और दामन की भांति एक दूसरे के अविभाज्य अंग बन गये हैं ।यह निश्चित कर पाना अति दुष्कर हो गया है कि कौन बड़ा है और कौन छोटा । गुंडे से बड़े है नेता , नेता से बड़ा है गुंडा पता नही भारत की नैया को कौन खेता है नेता बिच गुंडा है , कि गुंडा बिच नेता है कि गुंडा बना नेता है , की नेता बना गुंडा है ।

जबरन बन गए मालिक

जबरन बन गए मालिक जो चौकीदार है




जबरन बन गये मालिक जो चोकीदार है ,
 कागजी था शेर अब भेड़िया खूंखार है,
हमारी गलतियों का नतीजा ये हमारी सरकार है ,
सर से पैर तक एहशांफ़रामोशी भरी है जिनके ,
और हर इक रंग भी इसकी शातिरों-मक्कार है ,
हमारे ही वोटो से पुश्ते इनकी पलती है मगर ,
हमपे ही गुर्राए ...हद दर्जे का गद्दार हैं ,
 अपनी खिदमत के लिये हमने बनाया खुद इसे ,
 घर का जबरन बन गया मालिक जो चोकीदार है ,
 निभ सकी न इससे अब तक अपनी जिम्मेदारियां ,
चन्द दिनों में रुखसती का दिख रहा आसार है ,
सब तेरी मनमानियां सह ली मगर सुन ,
 फैसला करने को जनता देश को तैयार है ,
पूजना शैतान को हमारी मजबूरी नही ,
वोट ही हम लोगो की अहम तलवार है ।

किसी ने अल्लहा के नाम पे तो किसी ने राम के नाम पे

लड़ाया तो हमे सबने


लड़ाया तो हमे सबने ,
किसी ने अल्लाह के नाम पे लडाया ,
किसी ने राम के नाम पे लड़ाया ,
जो नही लड़े उन्हें दगाबाज कह के लड़ाया ।

जो इंसान को इंसान बनाता है

हर दर्द को हम उठाने के लिए तैयार है 


हर दर्द को हम उठाने के लिये तैयार है 
सिर्फ उस एहसास के लिये.....
 वही एहसास ........ 
जो इंसान को इंसान बनाता है ।

नंगी आँखो से देखा जब दुनिया का मंजर

नंगी आँखों से देखा जब दुनिया का मंजर



नंगी आँखो से देखा जब हमने दुनिया का मंजर ।

मुख में बाणी थी मीठी मगर पीठ के पीछे था खंजर ।।

आज यही आलम दुनिया में हर तरफ पसरा है ।

जिस धरती पर नाज था हमें आज हो गया है बंजर ।।

जिस दिन आम आदमी

जिस दिन आम आदमी खुद सुधर जाएंगे



जिस दिन हमारे देश के आम आदमी सुधर जायेगें उस दिन इस देश में भष्ट्राचार फैलाने वाले नही रह पायेगें

अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही

अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही



अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही ,
गिरता हूँ तो और संभल जाता हूँ मैं ,
 फिर एक नये साँचे में ढल जाता हूँ मैं ।

मेरे ही सपने टूट जाते क्यों

मेरे ही सपने टूट जाते क्यूँ


मेरे ही सपने
टूट जाते क्यूँ ,

बनने से पहले
आशियाँ उजड़ जाते क्यूँ ,

फुर्सत में मिलेगें
 तो बताऊंगा ,

समय से पहले
पड़ी है माथे पे
लकीरे क्यूँ ।।

विश्वास में शक्ति है

एक तिनका ही सही विश्वाश की बाते करे





क्यों घुटन नैराश्य , कुंठा त्रास की बातें करे ,
एक तिनका ही सही विश्वास की बातें करे ।

आपका ये दो मुहाँ दर्शन समझ आता नही ,
ले संकल्प फिर सन्यास की बातें करे ।

साथ रहते दुरिया लेकर बहुत दिन जी लिये ,
दूर रहकर अब दिलों से पास की बातें करें ।

खौप के बादल छटे हर स्वप्नदर्शी आँखों से ,
इंद्रधनुषी रंग भी मधुमास की बातें करें ।

दर्द तो दर्द है इसकी जाती की पहचान क्या ,
हर किसी के दर्द के अहसास की बातें करें ।।

अन्याय के विरुद्ध

जब अनाचार और अन्याय के विरुद्द गुस्सा मर जाय तो






जिस देश और समाज में अनाचार और अन्याय के विरुद्ध गुस्सा मर जाय वहां फिर किसी चाणक्य को नन्द के कुशासन के विरुद्ध शिखा खोलनी पड़ती है ।

जीवन एक समर भूमि है

जीवन एक समर भूमि है



यह दुनिया आदमी के मन की दया पर नही बल्कि उसकी कलाई की ताकत पर चला करती है ।आदमी की दुनिया में चल रही सारी दौड़ धूप केवल भोग के लिये होती है ।त्याग की बात मन्दिर , पुराण और कीर्तन में ही ठीक लगती है लिकिन जीवन कोई मन्दिर नही वह एक समर भूमि है ।