Friday, 25 December 2015

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गांव में

गली गली है यही वेदनां ,शहर -शहर हर गावं में ,

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गावं में ।

लोकतंत्र अभिशाप बन गया ,संसद आहे भरती है ,

नेताओं के नंगेपन से , भारत माता डरती है ।

निशदिन द्रोपदियो की , इज्जत लगी हुई है दाव पर ,

आजादी का कत्ल हुआ है ,आजादी के गांव में ,

संतरी से लेकर मंत्री तक , धन वैभव का होड़ है ,

देश धर्म के हत्यारों का कदम -कदम पर जोड़ है ,

कफ़न खसोटू बैठे सारे , कानूनों की नए में ,

आजादी का कत्ल जुआ है , आजादी के गांव में ।।


अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है

हम लोग कायरता के विरुद्ध पढ़ बोल और सुन तो सकते है पर कर कुछ नही सकते , कायरता का विषाणु हमारे अंदर घुस आये है , तभी तो सर और खौफ का मंजर समाप्त न होता ।अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है ।

हमे अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा

हमें अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा । भारत में बहुत कुछ है जो विश्व में कही नही है। हमारी संस्कृति की यह विशेषता है की वह अजर अमर है । किन्तु 68 वर्षो में हम जात-पात , सम्प्रदाय और ऊंच-नीच में बटते चले गये और बन्धुत्व को भूल गये । चिड़ियों और चींटियों की चिंता करने वाला हमारा समाज हिंसक बनता जा रहा है ।नफरत की फसल लगाने की होड़ लग गयी है ।अग्नि से यज्ञ करने के बजाए हम लोग आग लगाने में जुट गए है ।

निशाचरी शक्तियों का अभिशाप

देश लूट रहा है , पिट रहा है , आताताई , अराजक , निशाचरी शक्तियों का आतंक देश के जन जीवन के लिये स्थायी अभिशाप बनता जा रहा है ।

पचास साठ करोड़ लोग

सत्ताधीशो के तमाम दावेवेदारियों के बावजूद अभी भी पचास साठ करोड़ लोग बे मकान , बे रोटी लोगो का यह देश जिस अँधेरी सुरंग से गुजर रहा है उसका दूसरा सिर दूर -दूर तक नजर नही आता ।

यहां पे जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है

खुदा हमको बता दो , यह कैसी बस्ती है


खुदा हमको बतादो,यह कैसी बस्ती है ,
जहां जिंदगी के परदे में ,मौत पलती है ,

किसी की पाव तो पड़ते है फर्श मखमल पर
 किसी की लाश कफ़न के लिये तरसती है ,

 मेरे पड़ोस के जालिम ने लूट ली अस्मत,
कोई जवां लड़की यह कहती है और जलती है ,

यह कौन लोग है, मख्लूक कौन सी है ?
गर्दन को काट के कहते है , मस्ती मस्ती हैं ,

खुदा के घर को गिराते है और कहते है ,
 आवाज बुलन्द करो , खुदा की यह बस्ती है ,

न इनको खौफ -ए-खुदा है और न आदमी का ख्याल ,
यह कैसा धर्म है जहां , इंसानियत सिसकती है ,

जवां गुचों को कुचलो , कली मसल डालो ,
यहाँ पे जिंदगी महंगी है , मौत सस्ती है  ।

कृषि प्रधान देश

पहले था कृषि प्रधान देश ,
 सचमुच था ऋषि प्रधान देश ,
 पहले था आत्मीयता प्रधान देश ,
 वास्तव में संस्कृति प्रधान देश ,
मगर आज हो गया है ---
 कुर्सी प्रधान देश ,
मातम पुर्सी प्रधान देश ,
 नौटँकी प्रधान देश ,
 ढपोरशंखी प्रधान देश ,
घोटाला प्रधान देश ,
गड़बड़झाला प्रधान देश ,
भाषण प्रधान देश ,
कुशासन प्रधान देश ,
 खुदगर्जी प्रधान देश ,
 खुदमरजी प्रधान देश ,
 आबादी प्रधान देश ,
 बर्बादी प्रधान देश -