Thursday, 4 February 2016

आज़ादी के दीवाने रास बिहारी बोस , लाला हरदयाल आदि


आज़ादी के दीवाने रासबिहारी बोस ,लाला हरदयाल आदि



                   हम जिस आज़ाद भारत में साँसे ले रहे है उसकी आज़ादी बहुत सारे आज़ादी के दीवानो के कुर्बानियो के परिणाम है , उनमे से बहुत सारे स्वतंत्रता के पुजारियों के कुर्बानियो को हम जानते तक नही या उन्हें हम धीरे धीरे भूलते जा रहे है उन्ही कुछ आज़ादी के दीवानो में रास बिहारी बोस , शचीन्द्र सन्याल , लाला हरदयाल , करतार सिंह , बिष्णु गणेश पिंगले आदि बहुत सारे क्रांतिकारी थे । रासबिहारी बोस एक अत्यंत भीमकाय , लम्बा चौड़ा और बलवान पुरुष थे ।उनका पिता बिनोद बिहारी एक सरकारी प्रेस में किरानी थे । 1902 में इंटर की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी रास बिहारी बोष ने पढ़ाई छोड़ दी ।आज़ादी के दीवाने बन गए ।देशभक्ति की भावना भरने और क्रान्ति के लिए सैनिको को तैयार करने के लिये वे सेना में भर्ती होना चाहते थे ।पर वे असफल रहे । असफल होने के बाद वे दिल्ली से बनारस पहुँचे ।क्रांतिकारियों के संघटन के लिए , सुप्रसिद् क्रांतिकारी श्री शचीन्द्र सन्याल से सहयोग प्राप्त किया ।वे बंगाली टोली में छिप कर रहने लगे ।वे रात्रि में शचीन्द्र के दल वालो से मिल कर उन्हें बम और पिस्तौल चलाना सिखलाते थे ।एक दिन शचीन्द्र सन्याल ने एक अखबार ला कर दिखाया जिसमे उनके फोटो सहित गिरफ्तारी के लिये 7500 रुपया इनाम देने की सरकारी घोषणा छपी थी ।
                        पंजाब के लाला हरदयाल ने एम. ए. की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया । सरकार ने उन्हें छात्रव्रत्ति देकर आई. सी. एस. के लिये इंग्लॅण्ड भेजा । वहां इण्डिया हाउस के क्रांतिकारियों से उन्हें भेट हुई ।और वहीं से उनका विचार परिवर्तन हुआ । वे सरकारी छात्रव्रत्ति लेना अस्वीकार किया ।और देश को पराधीनता से छुड़ाने के लिए आज़ादी के लड़ाई में कूद गए । लन्दन , पेरिस और बर्लिन के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने के बाद वे अमेरिका चले गए । अमेरिका में 'इण्डिया हाउस ' का अनुकरण कर लाला हरदयाल ने 'युगांतर ' आश्रम की स्थापना की । वहां रहकर भारतीय युवको को स्वतन्त्रता की पाठ पढ़ा कर आज़ादी की लड़ाई में उतारने लगे । उनमे कुछ क्रांतिकारी भी मिल गए जो श्री करतार सिंह , बिष्णु गणेश पिंगले , सोहन लाल पाठक आदि थे ।लाला हरदयाल ने युगांतर आश्रम से ' गदर ' नामक समाचार पत्र भी निकालना आरंभ कर दिए ।उसका पहला अंक नवम्बर 1913 को हैण्ड प्रेस पर छप कर निकला । कुछ दिनों बाद छोटी छोटी पत्रिकाएं भी छपने लगी । जिनका वितरण 'गदर ' पत्र के साथ गुप्त रूप से भारत में भी होने लगा ।इसी के फलस्वरूप अमेरिका में रहने वाले भारतीय तन मन धन से स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए जागरूक हो गए । गदर दल ले सदस्यों की संख्या सात हजार से भी अधिक हो गई।
                     श्री करतार सिंह लुधियाना के निवासी थे । उनके पिता मंगल सिंह जो करतार सिंह के बचपन में ही कल बसे । प्राइमरी स्कुल की पढ़ाई अपने गावं ' सराबा ' में पूरी करने के बाद हाई स्कुल की पढाई लुधियाना से पूरी करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास उड़ीसा के कालिक में दाखिल लिए । उनके चाचा जंगल विभाग में एक उच्च पदाधिकारी थे । वही से उन्हें स्वदेस प्रेम उतपन्न हुई और किसी तरह 1912 में वे अमेरिक चले गए । और वे बाद में गदर पार्टी के सम्पादक बन गए । श्री बिष्णु गणेश पिंगलर पूना निवासी थे । इंजनियरिग की पढ़ाई के लिए वर अमेरिका गए और वे वहीं गदर दल के सदस्य बन गए । 1914 में जर्मन महायुद्ध छिड़ गया । क्रान्ति के लिए ये माकूल समय था ।करतार सिंह , बिष्णु पिंगले , सोहन लाल पाठक , सत्येंद्र सेन आदि अधिकांश ' गदर ' दल के सदस्यों को भारत भेजना आरम्भ किया गया । अमेरिका ने अंतराष्ट्रीय दबाब में क्रांतिकारियों को दमन करने का निश्चय कर सन्फ्रेन्सिस्को में धर पकड़ शुरू कर दी ।लाला हरदयाल किसी तरह छुपते हुए जर्मनी पहुच गये ।अमेरिकी सरकार ने जर्मन - भारत षड्यन्त्र केस चलाकर अनेक क्रांतिकारियों को दण्डित किया । गदर पार्टी के संचालन की जिम्मेदारी अब हरदयाल ने अपने विश्वासी रामचन्द्र को सौपा । जर्मन पहुचने पर हरदयाल की मुलाकात राजा महेंद्र प्रताप , चम्पक रमण पिल्ले , डा. भूपेंद्र दत्त आदि अनेक भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियो से हुई ।
वहां बर्लिन सोसाइटी नामक संस्था थी ।जो पुस्तके प्रकाशित कर अंग्रेजो के विरुद्द पुरे विश्व में प्रचार करने की काम करती थी ।उसके मंत्री थे स्वामी विवेकानन्द के भाई भूपेंद्र दत्त । इस तरह विदेशो में रहते हुए लाला हरदयाल की भाषाओ के झनकार हो गए थे । वे अपनी योगयता के आधार पर जर्मन विदेश मंत्री के सहायक बन गये ।एक समय वे जर्मन के राजदूत के रूप में तुर्की के सुलतान से भी मिले थे । इस तरह अनेक भूले विसरे स्वतन्त्रता सेनानियो के करनामें हमारे स्मृति पटल से मिटने लगे है । क्रमशः

आज़ादी के दीवाने


जिनके बलिदानियों को हम भूल गए ।


            23 दिसम्बर , 1912 ई. को लार्ड हार्डिंग पर बम 23 दिसम्बर , 1912 ई, के दिन लार्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली से निकलने वाली थी । जगह- जगह भारी सुरक्षा की व्यवस्था थी । शानो - शौकत की तमाशा देखने के लिये अपार जन समूह एकत्र था ।बादशाही ठाट में सजे - सजाये हाथी पर लार्ड बैठे झूम रहे थे ।आगे पीछे फ़ौज पुलिस की कतार ...। सवारी कोतवाली के सामने से मारवाड़ी लाइब्रेरी के पास पहुची तभी बम का जोरदार धमाका हुआ ।लार्ड का अंगरक्षक औंधे मुहँ गिर कर दम तोड़ रहा था और लार्ड औंधे मुहँ गिर पड़ा । संयोग से लार्ड बच गया । कुछ देर बाद लार्ड अपने जगह पर दिखाई पड़े ।और उनकी सवारी आगे निकल गई ।उसके बाद उपस्थित दर्शको को घेर लिया गया ।उनकी घण्टो तलाशी हुई ।महिलाओं को तलाशी के दौरान अपमानित किया गया । पर बम फेकने वाले का पता न चला । 

          लॉरेंस गार्डेन , लाहौर के एक बम केस में पुलिस श्री अवध बिहारी लाल को खोज रही थी ।राजा बाजार कलकत्ता में एक छापे मारी के दौरान उनका पता पुलिस को मिल गया ।उस पते के आधार पर पुलिस अमीरचंद के घर की तलाशी ली । अमिरचन्द्र दिल्ली के कॉम्ब्रिज मिशन है स्कुल में अध्यापक थे ।घर में अवध बिहारी लाल अपने दो साथी के साथ एक टोपी बम के साथ पकड़े गए ।साथ में लाहौर से भेजा गया दीनानाथ का एक पत्र भी सी . आई.डी. वालो के हाथ लग गया । उस समय मास्टर घर पर नही थे ।पर उनका दत्तक पुत्र सुलतान मौजूद था ।पुलिस उन सबको पकड़ कर ले गई ।रास्ते में मास्टर अमीचन्द घर लौटते समय पुलिस के हाथो लग गए । सुलतान को डरा धमाकर पुलिस ने अपना पक्षधर बना लिया । वह घर में आने जाने वाले क्रांतिकारियों का पता बता दिया ।साथ ही दीनानाथ के लिखावट को भी पहचान कर पुलिस को बता दिया ।दिल्ली षड्यंत्र के नाम से मुकदमा चला । मास्टर अमीरचंद , अवधबिहारी लाल , बालमुकुंद और बसन्त कुमार को फंसी की सजा मिली ।
       संगठनकर्ता रासबिहारी बोस इनलोगो के गिरफ्तारी के बाद दिल्ली छोड़ दिए । देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट में हेड क्लर्क रासबिहारी बोस थे ।उसने अमेरिका के सुप्रसिद् हिन्दुस्तानी विद्रोही लाला हरदयाल के एक शिष्य दीनानाथ , अवध बिहारी , बालमुकुंद को पर्चा बाटने और बम फेकने के लिये ठीक किये ।उनका एक बंगाली नौकर बसन्त कुमार विश्वास भी इस काम में उन लोगो का सहयोगी था । दिल्ली बम कांड केस में जैसी गवाही हुई उसे साबित हो गया की लार्ड पर बम फेकने में इनका हाथ था । इस मामले में अवध बिहारी , अमीरचंद और बसन्त को फांसी की सजा हुई ।पर आश्चर्य की बात , रासबिहारी बोस इतना अत्यंत बलवान और भीमकाय पुरुष थे पर कैसे पुलिस से बच कर भाग गए । आगे लाला हरदयाल और रास बिहारी बोस एवं अनेक क्रान्तिकारीयों को जिनके बलिदानो के फलस्वरूप हम आज़ाद हुए , जिन्हें हम जानते तक नही या हम भूल चुके उन क्रांतिकारीयों के करनामें ।