Thursday, 31 December 2015

आओ हमसब मिलजुल कर (2016)नव बर्ष का पर्व मनाये

आओ हम सब मिल जुल कर
नव बर्ष का पर्व मनाये
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राष्ट्र हितों के लिये समर्पित
हो फिर से सर्वस्व हमारा
गौरव मंडित हो भारत यह
सत्य धर्म का मिले सहारा
                      त्यागे हम सब स्वार्थ भावना
                      परमार्थ का पथ अपनाए
                      आओ हम सब मिल जुल कर
                      नव बर्ष का पर्व मनाये
भष्ट्राचार मिठे शासन का
शुद्व बने आचरण हमारा
अनाचार से लोहा लेने
बढ़े युवक भारत का सारा
                          अनुशासित हो कर्मी सारे
                           सत्य कर्मो को गले लगाये
                          आओ हम सब मिल जुल कर
                          नव बर्ष का पर्व मनाये
भगत -सुभाष -शिवा-राणा का
गूँजे भू पर गौरव गान
राम कृष्ण की परम्परा को
मिले पुनः भू पर सम्मान
                     सारे महि मण्डल को हम फिर
                      एक नया आलोक दिखाएं
                      आओ हम सब मिल जुल कर
                      नव बर्ष का पर्व मनाये
मित्र बने आपस में हम सब
मित्र भाव का हो विस्तार
उग्रवाद , आतंकवाद का
हो अति शीघ्र यहां निस्तार
                       बच्चे-बच्चे इस भारत के
                       शौर्य शील - बलशील कहाऐ
                        आओ हम सब मिलजुल कर
                        नव बर्ष का पर्व मनाएं
सुख समृद्धि सफलता का
हो हमारे जीवन में विस्तारण
सभी समस्याओ का हो फिर
यथा योग्य सम्पूर्ण निवारण
                        समरस हो सारा समाज यह
                          मानावत काबने हितैषी
                         सभी सुखी सम्पन्न बने फिर
                          प्रगति करें हम भौतिक ऐसी
राष्ट्र अस्मिता की रक्षा हित
हर्षित होकर प्राण लुटाएं
आओ हम सब मिलजुल कर
नव बर्ष का पर्व मनाये ।।



Sunday, 27 December 2015

जागो आंधी उठाने का जमा ना आ गया है

जागो आंधी उठाने का जमाना आ गया है


जागो आंधी उठाने का जमाना आ गया ,
दे रहा आदमी का दर्द अब आवाज दर-दर ,
 तुम न जागो तो कहो जमाना क्या कहेगा ,
 जब बहररों का नीलाम पतझर कर रहा है ,
 तुम नही फिर भी उठे तो आशियाना क्या कहेगा ,
 वक्त की तकदीर स्याही से, लिखी जाती नही है ,
 खून में कलम डुबोने का जमाना आ गया है ,
 बदतमीजी कर रहे है आज ,
 फिर भौरे चमन में जागो ,
आंधी उठाने को जमाना आ गया है ।।

Saturday, 26 December 2015

उठ देश कर त्राहि- त्राहि

उठ देश कर त्राहि - त्राहि 





उठ देश कर त्राहि - त्राहि अब तो इसे बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,
प्रलय काल की दुंदभी , गरल- सिंधु उफनाया ,
अनय वहि की लपटो में, सारा संसार समाया ,
हुआ राष्ट्र शापित , शापो पर अब तो नजर गड़ाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ,
अभय दान दो पशुता से , जकड़ी नरिह नरता को ,
हिंसा की जिह्वा पर बैठी , चीख रही जनता को ,
छली जा रही है संस्कृति , जड़ता को मार भगाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ , 
छल प्रपंच के कीचड़ दे , यह भरी हुई धरती है ,
उधर वासना तृषण फण , फैलाये से चलती है ,
लूट रही भारत की जनता को इन अत्याचारियों से बचाओ ,
एक बार भारत भू पर फिर माँ दुर्गे तुम आओ ।।

तो कौन प्रेम की सरिता बहाये


तो कौन प्रेम की सरिता बहाये




जब ढोंग नाग बनकर डंसने लगे
आदर्श नागफेनी से चुभने लगे
कृतिया मवाद सी बहने लगे
धर्म आतंक बनने लगे
तो ह्रदय के दग्ध कोने में
कौन प्रेम की सरिता बहाये --?
झूठी कल्पनाये
सारी जिंदगी हम बिस्तर बनने लगे
तो प्रेयसि और प्रियतम की सच्चाई
कहा तक होगी --?
जब घर घर विभीषण होने लगे
तो राम और लक्षमण की परिभाषा कैसी -----?
धन लगी जिंदगी में
विवाद बढ़ने लगे
रोपता फूलो को हूँ
कैक्टस उगने लगे
तो कैक्टस और नरगिस में अंतर कैसा ---?
जब से मिट गए है फर्क
उच्चता और निम्नता के
बदल गए है है सन्दर्भ आदर्श के
आ गयी है सीलन जीवन में
जहर पलने लगी है हरेक पेट में
और
कहते फिरते है हम अमृत उसे
सिलवटे पड़ने लगी है हरेक विस्तर में
दर्द के फफोले उगने लगे हरेक चेहरे में
न जाने आतंक कैसा हो
आशंका घेर रही है अभी से हमे ---?

Friday, 25 December 2015

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गांव में

गली गली है यही वेदनां ,शहर -शहर हर गावं में ,

आजादी का कत्ल हुआ है, आजादी के गावं में ।

लोकतंत्र अभिशाप बन गया ,संसद आहे भरती है ,

नेताओं के नंगेपन से , भारत माता डरती है ।

निशदिन द्रोपदियो की , इज्जत लगी हुई है दाव पर ,

आजादी का कत्ल हुआ है ,आजादी के गांव में ,

संतरी से लेकर मंत्री तक , धन वैभव का होड़ है ,

देश धर्म के हत्यारों का कदम -कदम पर जोड़ है ,

कफ़न खसोटू बैठे सारे , कानूनों की नए में ,

आजादी का कत्ल जुआ है , आजादी के गांव में ।।


अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है

हम लोग कायरता के विरुद्ध पढ़ बोल और सुन तो सकते है पर कर कुछ नही सकते , कायरता का विषाणु हमारे अंदर घुस आये है , तभी तो सर और खौफ का मंजर समाप्त न होता ।अन्याय सहना अन्याय करने से ज्यादा खतरनाक है ।

हमे अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा

हमें अपने संस्कार और संस्कृति दोनों की रक्षा में आगे आना होगा । भारत में बहुत कुछ है जो विश्व में कही नही है। हमारी संस्कृति की यह विशेषता है की वह अजर अमर है । किन्तु 68 वर्षो में हम जात-पात , सम्प्रदाय और ऊंच-नीच में बटते चले गये और बन्धुत्व को भूल गये । चिड़ियों और चींटियों की चिंता करने वाला हमारा समाज हिंसक बनता जा रहा है ।नफरत की फसल लगाने की होड़ लग गयी है ।अग्नि से यज्ञ करने के बजाए हम लोग आग लगाने में जुट गए है ।

निशाचरी शक्तियों का अभिशाप

देश लूट रहा है , पिट रहा है , आताताई , अराजक , निशाचरी शक्तियों का आतंक देश के जन जीवन के लिये स्थायी अभिशाप बनता जा रहा है ।

पचास साठ करोड़ लोग

सत्ताधीशो के तमाम दावेवेदारियों के बावजूद अभी भी पचास साठ करोड़ लोग बे मकान , बे रोटी लोगो का यह देश जिस अँधेरी सुरंग से गुजर रहा है उसका दूसरा सिर दूर -दूर तक नजर नही आता ।

यहां पे जिंदगी महंगी है मौत सस्ती है

खुदा हमको बता दो , यह कैसी बस्ती है


खुदा हमको बतादो,यह कैसी बस्ती है ,
जहां जिंदगी के परदे में ,मौत पलती है ,

किसी की पाव तो पड़ते है फर्श मखमल पर
 किसी की लाश कफ़न के लिये तरसती है ,

 मेरे पड़ोस के जालिम ने लूट ली अस्मत,
कोई जवां लड़की यह कहती है और जलती है ,

यह कौन लोग है, मख्लूक कौन सी है ?
गर्दन को काट के कहते है , मस्ती मस्ती हैं ,

खुदा के घर को गिराते है और कहते है ,
 आवाज बुलन्द करो , खुदा की यह बस्ती है ,

न इनको खौफ -ए-खुदा है और न आदमी का ख्याल ,
यह कैसा धर्म है जहां , इंसानियत सिसकती है ,

जवां गुचों को कुचलो , कली मसल डालो ,
यहाँ पे जिंदगी महंगी है , मौत सस्ती है  ।

कृषि प्रधान देश

पहले था कृषि प्रधान देश ,
 सचमुच था ऋषि प्रधान देश ,
 पहले था आत्मीयता प्रधान देश ,
 वास्तव में संस्कृति प्रधान देश ,
मगर आज हो गया है ---
 कुर्सी प्रधान देश ,
मातम पुर्सी प्रधान देश ,
 नौटँकी प्रधान देश ,
 ढपोरशंखी प्रधान देश ,
घोटाला प्रधान देश ,
गड़बड़झाला प्रधान देश ,
भाषण प्रधान देश ,
कुशासन प्रधान देश ,
 खुदगर्जी प्रधान देश ,
 खुदमरजी प्रधान देश ,
 आबादी प्रधान देश ,
 बर्बादी प्रधान देश -

Thursday, 24 December 2015

गुंडा बना नेता या नेता बना गुंडा

गुंडा बना नेता या नेता बना गुंडा


वर्तमान लोकतन्त्र में नेता और गुंडा चोली और दामन की भांति एक दूसरे के अविभाज्य अंग बन गये हैं ।यह निश्चित कर पाना अति दुष्कर हो गया है कि कौन बड़ा है और कौन छोटा । गुंडे से बड़े है नेता , नेता से बड़ा है गुंडा पता नही भारत की नैया को कौन खेता है नेता बिच गुंडा है , कि गुंडा बिच नेता है कि गुंडा बना नेता है , की नेता बना गुंडा है ।

जबरन बन गए मालिक

जबरन बन गए मालिक जो चौकीदार है




जबरन बन गये मालिक जो चोकीदार है ,
 कागजी था शेर अब भेड़िया खूंखार है,
हमारी गलतियों का नतीजा ये हमारी सरकार है ,
सर से पैर तक एहशांफ़रामोशी भरी है जिनके ,
और हर इक रंग भी इसकी शातिरों-मक्कार है ,
हमारे ही वोटो से पुश्ते इनकी पलती है मगर ,
हमपे ही गुर्राए ...हद दर्जे का गद्दार हैं ,
 अपनी खिदमत के लिये हमने बनाया खुद इसे ,
 घर का जबरन बन गया मालिक जो चोकीदार है ,
 निभ सकी न इससे अब तक अपनी जिम्मेदारियां ,
चन्द दिनों में रुखसती का दिख रहा आसार है ,
सब तेरी मनमानियां सह ली मगर सुन ,
 फैसला करने को जनता देश को तैयार है ,
पूजना शैतान को हमारी मजबूरी नही ,
वोट ही हम लोगो की अहम तलवार है ।

किसी ने अल्लहा के नाम पे तो किसी ने राम के नाम पे

लड़ाया तो हमे सबने


लड़ाया तो हमे सबने ,
किसी ने अल्लाह के नाम पे लडाया ,
किसी ने राम के नाम पे लड़ाया ,
जो नही लड़े उन्हें दगाबाज कह के लड़ाया ।

जो इंसान को इंसान बनाता है

हर दर्द को हम उठाने के लिए तैयार है 


हर दर्द को हम उठाने के लिये तैयार है 
सिर्फ उस एहसास के लिये.....
 वही एहसास ........ 
जो इंसान को इंसान बनाता है ।

नंगी आँखो से देखा जब दुनिया का मंजर

नंगी आँखों से देखा जब दुनिया का मंजर



नंगी आँखो से देखा जब हमने दुनिया का मंजर ।

मुख में बाणी थी मीठी मगर पीठ के पीछे था खंजर ।।

आज यही आलम दुनिया में हर तरफ पसरा है ।

जिस धरती पर नाज था हमें आज हो गया है बंजर ।।

जिस दिन आम आदमी

जिस दिन आम आदमी खुद सुधर जाएंगे



जिस दिन हमारे देश के आम आदमी सुधर जायेगें उस दिन इस देश में भष्ट्राचार फैलाने वाले नही रह पायेगें

अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही

अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही



अब ठोकरे खाने का मुझे खौफ नही ,
गिरता हूँ तो और संभल जाता हूँ मैं ,
 फिर एक नये साँचे में ढल जाता हूँ मैं ।

मेरे ही सपने टूट जाते क्यों

मेरे ही सपने टूट जाते क्यूँ


मेरे ही सपने
टूट जाते क्यूँ ,

बनने से पहले
आशियाँ उजड़ जाते क्यूँ ,

फुर्सत में मिलेगें
 तो बताऊंगा ,

समय से पहले
पड़ी है माथे पे
लकीरे क्यूँ ।।

विश्वास में शक्ति है

एक तिनका ही सही विश्वाश की बाते करे





क्यों घुटन नैराश्य , कुंठा त्रास की बातें करे ,
एक तिनका ही सही विश्वास की बातें करे ।

आपका ये दो मुहाँ दर्शन समझ आता नही ,
ले संकल्प फिर सन्यास की बातें करे ।

साथ रहते दुरिया लेकर बहुत दिन जी लिये ,
दूर रहकर अब दिलों से पास की बातें करें ।

खौप के बादल छटे हर स्वप्नदर्शी आँखों से ,
इंद्रधनुषी रंग भी मधुमास की बातें करें ।

दर्द तो दर्द है इसकी जाती की पहचान क्या ,
हर किसी के दर्द के अहसास की बातें करें ।।

अन्याय के विरुद्ध

जब अनाचार और अन्याय के विरुद्द गुस्सा मर जाय तो






जिस देश और समाज में अनाचार और अन्याय के विरुद्ध गुस्सा मर जाय वहां फिर किसी चाणक्य को नन्द के कुशासन के विरुद्ध शिखा खोलनी पड़ती है ।

जीवन एक समर भूमि है

जीवन एक समर भूमि है



यह दुनिया आदमी के मन की दया पर नही बल्कि उसकी कलाई की ताकत पर चला करती है ।आदमी की दुनिया में चल रही सारी दौड़ धूप केवल भोग के लिये होती है ।त्याग की बात मन्दिर , पुराण और कीर्तन में ही ठीक लगती है लिकिन जीवन कोई मन्दिर नही वह एक समर भूमि है ।